चंडीगढ़। चंडीगढ़ प्रशासन ने नगर निगम की ग्रांट-इन-एड पर कटौती और उपकमेटियों पर ऑब्जर्वर लगाने के प्रशासक के निर्णय के चलते निगम और प्रशासन में टकराव के हालात पैदा हो गए है। जहां ऑब्जर्वर नियुक्त करने की कार्रवाई को लेकर कांग्रेस पार्षद पिछले दरवाजे से भाजपा नेताओं की निगम पर काबिज करने की चाल बता रहे हैं, वहीं महापौर ने ग्रांट इन एड पर कट लगाने को चौथे वित्त आयोग की सिफारिशों के विरुद्ध करार दिया है।
चंडीगढ़ की महापौर के नेतृत्व में निगम पार्षदों का एक प्रतिनिधिमंडल चंडीगढ़ के प्रशासक के सलाहकार विजय देव से मिला व उनसे निगम की चालू वित्त वर्ष की ग्रांट-इन-एड की चौथी किस्त में कटौती न करने का अनुरोध किया। पिछले दिनों प्रशासन ने चालू वित्त वर्ष में बजट के आवंटित राशि के पूरी तरह से खर्च न होने के चलते निगम को दी जाने वाली ग्रांट की चौथी किस्त में लगभग 58 करोड़ रुपये पर कट लगा दिया था। महापौर पूनम शर्मा ने प्रशासक को बताया था कि इससे शहर के विकास के लिए चालू परियोजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
महापौर का कहना था कि इस प्रकार कट लगाया जाना चौथे दिल्ली वित्त आयोग की सिफारिशों के भी विरुद्ध है। महापौर ने चंडीगढ़ के प्रशासक द्वारा निगम की उपकमेटियों की कार्यप्रणाली की मोनिटरिंग के लिए आब्जर्वर लगाये जाने की प्रस्तावित योजना का भी विरोध किया। चंडीगढ़ में लागू पंजाब म्युनसिपल एक्ट, 1972 के अनुरूप महापौर ने 11 उप कमेटियां बनाकर प्रशासन के पास अप्रूवल के लिए भेजी थीं। प्रशासक के सलाहकार से मंज़ूरी मिलने के बाद प्रशासक कप्तान सिंह सोलंकी की मंज़ूरी के लिए फाइल भेजी दी गई थी। सूत्रों के अनुसार प्रशासक ने कमेटियों पर ऑब्जर्वर लगाने की तैयारी कर ली है। इस संबंध में गवर्नर हाउस के एक अधिकारी ने निगम के संयुक्त आयुक्त को फोन कर सूचित भी कर दिया।
एक्ट के अनुसार निगम की सभी कमेटियों व उपकमेटियों में चुने और मनोनीत पार्षद ही सदस्य बनते हैं। हर कमेटी की मीटिंग में संबंधित विंग के एजेंडे अप्रूव होते हैं। उसके बाद ही निगम द्वारा संबंधित परियोजनाओं पर काम शुरू करवाया जाता है। कांग्रेस पार्षदों का कहना है कि ऑब्जर्वर की नियुक्ति कांग्रेस शासित चंडीगढ़ नगर निगम पर पिछले दरवाजे से भाजपा को बिठाने की यह एक राजनीतिक चाल है। इससे भाजपा नेता अधिक शक्तिशाली हो जायेंगे, क्योंकि प्रशासक तो ऑब्जर्वर को ही सही मानेंगे।