चंडीगढ़ (कमलेश भारतीय) - समाज में फिल्मी गीतकार को बहुत छोटा करके आंकते हैं जबकि फिल्मी गीतों के बोल सब गुनगुनाते हैं। साहित्य किसी फॉर्मूले से नहीं बल्कि भाजना से चलता है, ऐसे ही गीत भी भावना से लिखे जाते हैं। यह कहना है प्रसिद्घ फिल्मी गीतकार इरशाद कामिल का। वे आज पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अपनी माताश्री बेगम इकबाल बानो की स्मृति में विभाग की दो छात्राओं को 21000 व 12000 रुपये की छात्रवृति शुरू करने आये थे। उनके साथ धर्मपत्नी तस्वीर कामिल, बेटा कामरान व बड़े भाई सलीम अख्तर भी मौजूद थे। बड़े भाई सलीम अख्तर ने बताया कि वे बैंक में अधिकारी थे और इसी नाते हिंदी में एम. ए. करने को प्रोत्साहित किया था कि इरशाद हिंदी अधिकारी बन सकेंगे। इस पर इरशाद ने कहा कि मेरे बड़े भाई यह नहीं जानते थे कि साहित्य का रास्ता कहीं और भी जाता है। इस तरह वे फिल्मी गीतकार बने। हालांकि इरशाद ने कुछ समय जनसत्ता व दैनिक टिब्यून में भी काम किया, पर नौकरी उन्हें बांध नहीं पाई और मुम्बई जाने से रोक नहीं पाई।
पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से इरशाद ने न केवल एम. ए. हिंदी किया बल्कि समकालीन हिंदी कविता पर शोध कार्य भी किया, जिसे प्रकाशित किया जा चुका है। अब उनका नाटक बोलती दीवारें वाणी प्रकाशन से व आधा अधूरा वादा प्रकाशित होने जा रहे हैं। आधा अधूरा वादा में फिल्मी गीतों के पीछे की कहानी होगी, रोचक। फिलमी गीतों के बावजूद अभी इरशाद की कवितायें भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। बारिश की बूदों व खुशगुबार मौसम को देख कर सवाल किया कि गीत लेखन के लिए कौन सा मौसम पसंद है? इसके जवाब में इरशाद का कहना था - इमरजेंसी मौसम क्योंकि फिल्मी गीत मौसम को देख कर नहीं इमरजेंसी को देख कर लिखे जाते हैं। इस पर खूब ठहाके लगे और इस तरह इरशाद से फिर मिलने की बात कह कर विदा ली।
इरशाद ने बताया कि वे मालेरकोटला के रहने वाले हैं और बी. ए. तक वहीं से शिक्षा प्राप्त की। दसवीं-ज्यारहवीं में थे कि शायरी शुरू कर दी। इस पर मां बहुत चिंतित हुई और एक बड़े शायर के पास लेकर गये परिवार वाले और उस शायर ने कहा कि जब तक दस बार दिल न टूटे और बीस-पच्चीस बार पयार न हो तो शायर कैसे बन सकते हो मियां? खैर, उनका मतलब अनुभव से था। यहां भी मंच पर इरशाद ने कहा कि वे एक नहीं बल्कि कई प्रेम करते हैं। इनमें हिंदी विभाग से पूर्व छात्र होने के नाते प्रेम और मां से प्रेम व आदर के चलते ही छात्रवृत्ति की शुरुआत की। पंजाब विश्वविद्यालय के गीत लिखा और उसके पारिश्रमिक के पचास हजार रुपये भी हिंदी विभाग को ही अर्पित कर दिये थे। यहीं क्यों हिंदी विभाग को दो एयरकंडीशनर भी अर्पित कर रखे हैं। साहित्यिक पुस्तकें व साहित्यिक फिल्मों की डी. वी. डी. तक विभाग को भेंट की हैं।
पहली फिल्म-सोचा न था के लिए इरशाद कामिल के गीत लिखने की शुरुआत हुई थी, जो रॉक स्टार, गुंडे, आशिकी-2, अजब प्रेम की गजब कहानी जैसी कितनी ही फिल्में हें, जिनमें इरशाद के गीत गूंजे। अक्षय कुमार की फिल्म हॉलीडे व शाहरुख खान की फिल्म हैप्पी न्यू इयर में भी इरशाद के गीतों पर ही ये स्टार नाचते दिखेंगे। इम्तियाज अली और इरशाद कामिल की दोस्ती संघर्ष के दिनों से है और इसलिए हर प्रोजेक्ट में एक साथ होते हैं।