चंडीगढ़ – (धर्मेन्द्र सिंह) भारत में हर साल दो से तीन लाख लोगों के किडनी फेल होने के ऐसे मामले होते हैं जिन्हें डायलिसिस की जरूरत होती है। ऐसे लोगों को कम खर्च में लंबे समय तक स्वस्थ रहने के लिए गुर्दा प्रत्यारोपण ही एक विकल्प है। इसके लिए सबसे पहले तो गुर्दा देने वाले और लेने वाले दोनों के ब्लड ग्रुप को मिलाया जाता है और करीब 40 प्रतिशत मामलों में मरीज के रिश्तेदारों का ब्लड ग्रुप मैच नहीं करता है। लेकिन, आईवी हॉस्पिटल मोहाली के चिकित्सकों ने यह साबित कर दिखाया है कि ब्लड ग्रुप मैच न होने पर भी सफलता पूर्वक गुर्दा प्रत्यारोपण किया जा सकता है और शहर में ही मरीज की जान बचायी जा सकती है। इस विधि को एबीओ इन्क पेटिबल ट्रांसप्लांट कहा जाता है और देश में इसके गिने-चुने केस ही सामने आये हैं।
आईवी हॉस्पिटल में एबीओ इन्क पेटिबल ट्रांसप्लांट प्रोग्राम शुरू हो चुका है। पिछले एक माह में यहां डॉक्टरों ने दो ऐसे मामलों में सफलता पायी है। दोनों मरीज ठीक-ठाक से डिस्चार्ज हुए। पहला मरीज, लखविंदर सिंह गुर्दे फेल होने के कारण डेढ़ साल से डायलिसिस के सहारे जीवित था। उसे गुर्दा प्रत्यारोपण की सलाह दी गयी थी। उसके परिजन गुर्दा देने को राजी थे, लेकिन उनमें से किसी का भी ब्लड गु्रप मरीज के ओ ब्लड से मैच नहीं कर रहा था। रिश्तेदार उ मीद छोडऩे लगे थे। परंतु लखविंदर को नयी जिंदगी देने के लिए प्रतिबद्ध चिकित्सक दल ने चमत्कार कर दिखाया।
आईवी हॉस्पिटल मोहाली के गुर्दा रोग विभाग की डायरेक्टर डॉ. राका कौशल और रीनल ट्रांसप्लांट सर्जरी विभाग के डायरेक्टर डॉ. अविनाश श्रीवास्तव ने नॉन-मैचिंग किडनी ट्रांसप्लांट को अंजाम देने में कामयाबी पायी। लखविंदर की पत्नी का ब्लड ग्रुप ओ था। उसने एक गुर्दा दान करके अपने पति की जान बचा ली।
चंडीगढ़ पे्रस क्लब में पत्रकारों से चर्चा करते हुए डॉ. अविनाश श्रीवास्तव ने बताया, सामान्य ‘प्रत्यारोपण में मरीज को प्रोसीजर से दो दिन पहले ही अस्पताल में भर्ती किया जाता है। लेकिन लखविंदर को ट्रांसप्लांट से एक सप्ताह पहले भर्ती कर लिया गया था। उसका प्रोसीजर 12 अप्रैल को संपन्न हुआ।’
आईवी हॉस्पिटल की डायरेक्टर डॉ. कंवलदीप ने बताया कि ‘जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों में ऐसे नॉन-मैचिंग ट्रांसप्लांट अक्सर ही होते रहते हैं, परंतु भारत में डॉक्टर अभी तक इस जटिल प्रोसीजर से दूर ही रहे हैं। ऐसे में आईवी हॉस्पिटल देश के उन गिने-चुने कामयाब गुर्दा अस्पतालों की क्रीम कैटेगरी में आ खड़ा हुआ है जहां इस तरह की नवीनतम और दुर्लभ ट्रीटमेंट टैक्नीक अपनायी जाती है।’
डॉ. राका कौशल ने बताया, ‘प्लाज्माफेरेसिस विधि से एंटीबॉडीज को फिल्टर करने के बाद मरीज को इंजेक्शन दिये गये ताकि एंटीबॉडी फिर से न पैदा हो जायें। इस तरह रिजेक्शन की आशंका दूर होने के बाद ही मरीज को गुर्दा प्रत्यारोपित किया गया। सर्जरी के बाद पांच दिन चिंता वाले थे, क्योंकि रिजेक्शन होता तो उसी समय होता।’
क्रॉस ट्रांसप्लांट का खर्च थोड़ा ज्यादा आता है। परंतु मरीज को डायलिसिस पर लिटाये रख कर किसी उपयुक्त गुर्दा दानदाता का इंतजार करने पर जो भारी लागत आ सकती है, उसके मुकाबले फिर भी यह खर्च कम ही बैठता है। ऐसे प्रोसीजर करवाने वालों की सं या बढऩे पर इसकी लागत में भी कमी आयेगी। प्रेस कांफ्रेंस को पैथोलॉजी विभाग के हेड डॉ. वरुण हटवाल एवं किडनी विभाग के ऑपरेशन मैनेजर संतोष कुमार सिंह ने भी संबोधित किया।