चन्डीगढ़ : व्यापारियों के शीर्ष संगठन कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्ज (कैट) जो विगत अनेक वर्षों से इस मुद्दे पर देशव्यापी आन्दोलन चला रहा है ने आज इस विषय पर उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई टिपण्णी जिसमें सरकार को आदेश दिया गया है कि तीन सप्ताह के अन्दर वो अदालत को बताये कि सरकार की इस नीति से छोटे व्यापारियों को नुकसान न पहंँुचने के क्या इंतजाम किये गए हैं, को बहुत ही आधारभूत और व्यवहारिक रुख बताया है । कैट के चन्डीगढ़ चैप्टर के अध्यक्ष श्री हरीश गर्ग ने उच्चतम न्यायालय की इस टिपण्णी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि इस से कैट द्वारा लगातार सरकार की नीति और नीयत पर उठाये जा रहे सवालों को बल मिला है। उन्होंने कहा कि ‘‘ लोकतंत्र में तानाशाही प्रवृती ’’ पर न्यायालय की इस टिपण्णी को एक तरह से उच्चतम न्यायालय द्वारा नजर रखना भी कहा जा सकता है।
श्री हरीश गर्ग ने कहा कि भारतीय संविधान का मूल आधार सामाजिक एवं आर्थिक न्याय पर टिका है और सरकार द्वारा अधिसूचना सीधे तौर पर इस मौलिक भावना का उल्लंघन करती है क्योंकि विदेशी कम्पनियों की असीमित शक्तियों के कारण देश के रिटेल व्यापार में उनका प्रवेश देश में असंतुलित प्रतिस्पर्धा पैदा करेगा जिसके कारण छोटे व्यापारी और करोड़ों लोग जो उन पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं को बेरोजगार होना पड़ेगा। उच्चतम न्यायालय ने इस विषय को बेहद गंभीरता से लिया है और निश्चित रूप से इस कदम से संविधान सर्वोच्च है, ये स्थापित होता है।
उन्होने कहा कि इस मामले में केन्द्र सरकार ने छोटे व्यापारियों अथवा रिटेल व्यापार से जुड़े अन्य वर्गों से कोई सलाह तक नहीं की और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीें किया और सही तथ्यों एवं तस्वीर देश अथवा संसद को नहीं बताई जो लोकतंत्र के खिलाफ है। उच्चतम न्यायालय द्वारा यह पूछा जाना के सरकार की इस नीति के कारण विदेशी कम्पनियों के हाथों छोटे व्यापारी कैसे सुरक्षित रहेंगे , एक बड़ा सवाल है जिस पर अब सरकार को जवाब देना ही होगा। जिस तरह संसद में जुगाड़ राजनीति के चलते बहुमत जुटाकर लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाई गयी वो साफ न्यायलय की निगाह में है।