चण्डीगढ़ - कविता भीतर की प्रेरणा से लिखता हूं। कविताएं सोच-विचार कर लिखने की कोशिश नहीं करता। दूसरी बात कविता देश, समाज व धर्म में जो भी गलत होते देखता हूं, उसके विरुद्घ आवाज़ उठाने के लिए लिखता हूं। यह कहना है आचार्य रूपचंद्र का। वे अकादमी भवन में साहित्य संगम द्वारा हंस अकेला औपन्यासिक कृति पर आयोजित विचार-संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि धर्म हृदय से जोड़ता है। धर्म हृदय की आवाज़ है। उपासना व पूजा धर्म का एक पक्ष है जबकि भीतर से उसे ऊंचाई तक जाएं और समाज-कल्याण की भावना प्रमुख रहे तभी सार्थकता है। उन्होंने मुक्तक के माध्यम से अपनी बात रखीः
यों तो जीवन के हर क्रम में,नियम प्रमुख होता है
किंतु कभी ऐसा भी अवसर, जब सम्मुख होता है
प्रेम पगी पलकों में,ज्वार भावना का उमड़ा हो
उस पल नियम टूटने का भी,अपना ही सुख होता है।
उल्लेखनीय है कि जीरकपुर की साहित्यिक संस्था साहित्य संगम के अध्यक्ष फूलचंद मानव व योगेश्वर कौर ने आचार्य रूपचंद्र के जीवन पर विनीता गुप्ता द्वारा लिखित औपन्यासिक कृति हंस अकेला पर विचार-संगोष्ठी का आयोजन किया था। हरियाणा ग्रन्थ अकादमी के उपाध्यक्ष व कथाकार कमलेश भारतीय ने मंच-संचालन करते कहा कि आचार्य ने यह प्रमाणित कर दिया कि संतों में आज भी कवि होना व कवियों में संतों की भावना होना बहुत जरूरी है। हंस अकेला पर दैनिक ट्रिब्यून के पूर्व संपादक विजय सहगल, पंजाबी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्वाध्यक्ष डॉ. मनमोहन सहगल, विष्णु सक्सेना व सुरेश हंस ने सारगर्भित आलेख प्रस्तुत किए।
लेखिका विनीता गुप्ता ने प्रारम्भ में हंस अकेला के लेखन की बात सामने रखी। मनमोहन सगहल ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की जबकि केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल की धर्मपत्नी श्रीमती मधु बंसल मुख्यातिथि के रूप में मौजूद थीं। सीताराम बंसल, दिनेश बंसल व उनके परिवार ने आचार्य को सम्मानित किया। यमुनानगर से आए पंजाबी के प्रमुख कवि डॉ. रमेश कुमार ने दो कवितायें प्रस्तुत कीं। नन्हें बच्चों गगन व लग्न ने दो ़गज़लें सुना कर व सौरभ मुनि व सुखदेव सिंह ने भी गज़ल व भजन से समां बांध दिया। डॉ. सुभाष रस्तोगी ने सैली बलजीत व फूलचंद मानव ने सुरेश हंस की रचना-यात्रा पर चर्चा की।
केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा पुरस्कार दिये जाने के उपलक्ष्य में पठानकोट के सैली बलजीत व बठिंडा के सुरेश हंस को आचार्य ने शॉल ओढ़ा कर सम्मानित किया।