चंडीगढ़ - निटर सेक्टर 26 में आयोजित दी फ्लड इन पंजाब : इंपैक्ट्स चैलेंजिस एंड पाथवे टू रेसिलियंस में पंजाब में हर वर्ष आने वाली बाढ़ पर गंभीर चिंता सहित , हर वर्ग के विशेषज्ञों ने बाढ़ के मूल कारणों पर मंथन किया।
सेमिनार का आयोजन संयुक्त रूप से इंडियन इंस्टीट्यूट आफ डेमोक्रेटिक लीडरशिप , खेती विरासत मिशन व नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्निकल टीचर ट्रेंनिंग एंड रिसर्च चंडीगढ़ द्वारा हुआ व रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ डेमोक्रेटिक लीडरशिप से डॉ. मनीष जांगिड़ संयोजक थे और डीएवी कॉलेज से डॉ. भारती सम्मेलन के सह-संयोजक थे। सम्मेलन लगातार चार सत्रों में आयोजित किया गया, जिसमें बाढ़ के मुद्दों के साथ-साथ पंजाब में इसके प्रभाव और चुनौतियों पर चर्चा की गई। तीसरा और चौथा सत्र विशेष रूप से बाढ़ नीतियों और बाढ़ शमन और राहत के लिए सामाजिक आंदोलनों पर केंद्रित था।
भारत के कई राज्यों में बाढ़ एक वार्षिक कैलेंडर की तरह बन गई है. राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने देश में चार करोड़ हेक्टेयर भूमि को बाढ़ प्रवण क्षेत्र घोषित किया है। उत्तर भारत की ज्यादातर नदियाँ उफान पर हैं, खासकर उत्तर प्रदेश और पंजाब की नदियाँ। पिछले कुछ दशकों में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और पंजाब अचानक आई बाढ़ से जलमग्न हो गए हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या बाढ़ रोकने का कोई उपाय है?
अगर हर साल ऐसी बाढ़ आती रही तो आगे क्या होगा? आज के सेमिनार में शामिल सांसद सतनाम सिंह संधू , खेती विरासत मिशन के उमेन्द्र दत्त , डॉ जयंत कुलकर्णी , हिमांशु ठकर ,सोम दत मिश्रा , डॉ सीमा तेजपाल बताते हैं कि हम नदियों के प्रवाह को रोक रहे हैं और निपटान की कोई व्यवस्था नहीं है। इसके चलते बाढ़ का पानी ग्रामीण इलाकों से शहरी इलाकों की ओर भी आ जाता है , बांधों के रख रखाव की लापरवाही , नदियों के छेत्र में घरों का निर्माण , डैम ऑपरेशन में पारदर्शिता, फ्लड मैनजमेंट आदि पर गहन चर्चा हुई।