नई दिल्ली 9 अप्रैलः नई दिल्ली में दूसरा भारत जल-सप्ताह इस आह्वान के साथ शुरू हो गया है कि पानी का समुचित उपयोग और प्रबंधन किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने पांच दिन के इस सम्मेलन का कल उद्घाटन करते हुए कहा कि देश में बार-बार के सूखे और बाढ़ों को देखते हुए से जल संसाधनों के प्रबंधन को बेहतर बनाने की आवश्यकता है। इसलिए बढ़ती जनसंख्या तथा आर्थिक विकास की जरूरतों के लिए उपलब्ध जल का समुचित प्रबंधन किया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए केंद्रीय जल संसाधन मंत्री श्री हरीश रावत ने जल क्षेत्र के महत्व को ध्यान में रखते उनके मंत्रालय द्वारा किये जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कुशल जल प्रबंधन के लिए विकसित और विकासशील देशों के बीच प्रौद्योगिकी और ज्ञान के हस्तांतरण तथा अनुभवों के प्रभावी आदान-प्रदान की आवश्यकता है। इसके अलावा बढ़ती आबादी और शहरीकरण तथा विकास की आवश्यकताओं के कारण पानी की मांग बढ़ रही है। इस समय हमारे देश की आबादी एक अरब 21 करोड़ से भी ज्यादा है, जो दुनिया की कुल आबादी की लगभग 18 प्रतिशत है, जबकि हमारे पास इस्तेमाल किये जाने योग्य दुनिया के कुल पानी का केवल 4 प्रतिशत है और कृषि भूमि 2.3 प्रतिशत है।
श्री रावत ने कहा कि हमारा देश सीमित पानी वाला देश है और प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता और कम होने से भारत जल्दी ही पानी की कमी वाला देश हो जायेगा। इस समय देश में पानी की प्रति व्यक्ति वार्षिक उपलब्धता 1545 घन मीटर है, जो 2050 में 1,140 घनमीटर रह जायेगी।
इसके लिए भी 2050 तक भारत को 450 अरब घनमीटर की जल भंडारण क्षमता की आवश्यकता होगी। इस समय हमारे पास 253 अरब घनमीटर की जल भंडारण क्षमता है। इस महत्वपूर्ण कार्य को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय जल नीति 2012 में इस पर विशेष रूप से जोर दिया गया है।
श्री रावत ने त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम पर विशेष जोर देने के लिए योजना आयोग और मंत्रिपरिषद के प्रति आभार प्रकट किया। इस कार्यक्रम में वर्तमान परियोजनाओं के विस्तार, नवीकरण और आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में परियोजनाओं की मरम्मत, नवीकरण और फिर से उपयोग के योग्य बनाने के लिए 6235 करोड़ रूपये की राशि रखी गई। मौजूदा बांधों की सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए बाँध पुनर्वास, सुधार परियोजना पर भी जोर दिया गया है।
श्री रावत ने कहा कि उत्तरी क्षेत्र की अधिकतर नदियां हिमालय से निकलती हैं। पिछले डेढ़ दशक में पर्वतीय और अर्थ-पर्वतीय क्षेत्रों में अधिकतर जल प्रपात सूख गए है। इस समस्या के हल के लिए पर्वतीय इलाके के जल ग्रहण क्षेत्रों में छोटे-छोटे जलाशय बनाने की आवश्यकता है।
सप्ताह भर के इस सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के नीति- निर्माता और प्रौद्योगिकीविद् भाग ले रहे हैं, जो कृषि और सिंचाई, ऊर्जा तथा उद्योग जैसे अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जल संसाधन प्रबंधन से जुड़े हुए हैं।