वाराणसी - सभी दुख-तकलीफ भुलाकर वे जमकर नाच रही थीं, फाग गा रही थीं और गुलाल व पंखुडय़िों से खेल रही थीं। शुक्रवार को गंगा के अस्सी घाट पर दुख की कोई जगह नहीं थी। यह हालांकि होली का मौका नहीं था लेकिन फिर भी अपने घर से दूर रह रहीं विधवाओं के लिए एक यादगार दिन तो था ही। मंदिरों के इस शहर में हजारों विधवाएं अपने करीबियों से दूर आश्रमों में जीवन बिताने को मजबूर हैं।
करीब 100 विधवाएं, ज्यादातर अधिक उम्र कीं, उस पुराने नियम को चुनौती देती आईं, जो उन्हें किसी भी प्रकार के उत्सव से दूर रहने को कहता है। समाज उस स्त्री, जिसके पति का देहांत हो चुका हो, को खुशी और शादी आदि में भाग लेने से रोकता है। अपनी उम्र की गोधुली बेला में पहुंच चुकीं ये बूढ़ी विधवाएं नाव में बैठकर गंगा के अस्सी घाट पर जमा हुईं। यहां वे जमकर नाचीं और गुलाल उड़ाया।
सारनाथ के ओल्ड एज होम में रहने वाली नौरंगी देवी की बात सुनकर अंदाजा लग सकता है कि आखिर इनके जीवन में इस दिन का क्या महत्व है। भावुक होकर नौरंगी कहती हैं, आज हमारे बेरंग जीवन में रंग भर गया, मैं बहुत खुश हूं। नौरंगी को न तो अपनी बूढ़ी हो चुकी काया की फिक्र थी और न ही सेहत का ख्याल। वह बेलौस अंदाज में नाचते हुए दूसरों पर गुलाल और फूलों की पत्तियां उड़ा रही थीं। दुर्गाकुंड एज ओल्ड होम और ललिता घाट आश्रम में रहने वाली नमोना गौटल तो मानो खुशी से रो ही पड़ीं।