स्टॉकहोम - 2015 में मेडिसिन फील्ड में दिए जाने वाले नोबेल प्राइज का सोमवार को ऐलान कर दिया गया। प्राइज का आधा हिस्सा आयरलैंड के विलियम कैंपबेल और जापान के सतोशी ओमुरा को राउंडवर्म पैरासाइट्स के इन्फेक्शन की दवा विकसित करने के लिए दिया गया है, वहीं दूसरा हिस्सा चीन के यूयू तु को मलेरिया बीमारी के इलाज की दिशा में की गई खोज के लिए मिला है। इस पुरस्कार के तहत 80 लाख स्वीडिश क्राउन (960000 डालर) की रकम प्रदान की जाती है।
नोबल प्राइज देने वाली अथॉरिटी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि इस साल के नोबेल प्राइज विनर्स ने कुछ बेहद खतरनाक परजीवी बीमारियों के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। बता दें कि मच्छर से होने वाली मलेरिया जैसी बीमारी से हर साल दुनियाभर में 450000 से ज्यादा लोग मारे जाते हैं। वहीं, अरबों लोगों में इससे इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। राउंडवर्म पैरासाइट्स से दुनिया की एक तिहाई आबादी प्रभावित है।
इससे रिवर ब्लाइंडनेस और लिंफैटिक फायलैरियासिस समेत कई बीमारियां होती हैं। कई दशकों बाद इन बीमारियों से जुड़ी दो दवाओं की खोज गेमचेंजर साबित हुई हैं। इसमें रिवर ब्लाइंडनेस और लिंफैटिक फायलैरियासिस के लिए एवरमैक्टिन और मलेरिया के लिए आर्टेमिसिनिन दवा की खोज हुई है। रिवर ब्लाइंडनेस में तेज खुजली, त्वचा का रंग बदलना, चकत्ते और आंखों की बीमारी होती है, जो बाद में स्थायी नेत्रहीनता में तब्दील हो सकती है।