चंडीगढ, 16 जनवरी- हरियाणा ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि बेहतर वित्तीय प्रबन्धन वाले राज्यों के लिये बाजार उधारियों का स्तर बढाया जाना चाहिए,क्योंकि कुल बाजार उधारियों में राज्यों के हिस्सों में गिरावट हो रही है, जबकि केन्द्र का हिस्सा बढ़ रहा है। इससे राज्यों की संसाधन उपलब्धता पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
हरियाणा के वित्त मंत्री श्री हरमोहिन्द्र सिंह, जो आज नई दिल्ली में केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री पी चिदम्बरम की अध्यक्षता में राज्य तथा केन्द्रीय शासित प्रदेशों की वित्त मंत्रियों की पूर्व बजट बुलाई गई बैठक में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि हरियाणा अपनी ऋण देनदारियों को कार्य कुशलता तथा उत्पादकता में बिना किसी हानि के पुन: अदायगी करने की क्षमता रखता है।
उन्होंने कहा कि 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान हरियाणा ने वित्तीय संसाधन जुटाने में देश के बड़े राज्यों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। केन्द्रीय योजना आयोग द्वारा 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिये राज्यों के लिये वित्तीय संसाधन पर गठित किये गये कार्य दल ने रिकार्ड पर रखा है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान वित्तीय संसाधन जुटाने के 92.5 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसतन लक्ष्य की तुलना में हरियाणा 192 प्रतिशत अधिक दर हासिल कर सका। हरियाणा में परिव्यय तथा ऋण प्रबन्धन को योजना आयोग तथा विभिन्न वित्तीय आयोगों द्वारा सराहा गया है।
उन्होंने कहा कि गैर योजनागत परिव्यय पर सरकार के प्रतिबद्घता के बढऩे, बिजली निगमों की वित्त प्रणाली को पुन: संरचना, विभिन्न कृषि आदानों पर सबसिडी के कारण राज्य की देनदारियां बढ़ी हैं। इसके अलावा सबसिडी दरों पर बिजली, भूमि अधिग्रहण के लिये मुआवजा, गन्ना उत्पादकों को राज्य सलाहकार मूल्यों पर की गई अदायगी की गई। इसके फलस्वरूप विभिन्न राज्यों की अर्थोपाय स्थिति पर दबाव बढ़ा है।
उन्होंने कहा कि हरियाणा की अर्थ-व्यवस्था एक कृषि राज्य से सेवा क्षेत्र की ओर बढ़ रही है। वर्ष 2011-12 में राज्य सकल घरेलू उत्पादन दर में सेवा क्षेत्र का 54.6 प्रतिशत योगदान रहा,जो वर्ष 2005-06 में 44.3 प्रतिशत था। हरियाणा की कर राजस्व राज्य सकल घरेलू उत्पादन दर अनुपात भी कम हुआ है। वर्ष 2005-06 में यह 8.53 प्रतिशत था, जो वर्ष 2012-13 में 6.46 प्रतिशत हो गया है। हालांकि सेवा क्षेत्र कर पर केन्द्र सरकार का प्रभुत्व होने के कारण राज्य के पास अतिरिक्त वित्तीय संसाधन जुटाने की संभावना सीमित हो गई है। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं के लिये प्रावधान तथा समाज के कमजोर वर्गों का कल्याण राज्य सरकारों की जिम्मेवारियां हैं। राज्य की बढ़ती हुई विकासात्मक जरूरतों को पूरा करने तथा स्वयं के असमुचित कर संसाधनों के चलते राज्यों के पक्ष में संसाधन बढ़ाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय खाद्य निगम की ओर से खाद्यान्न खरीद प्रबन्धन के लिये राज्य सरकार पर ऋण बढ़ा है और इस आंकडे को वित्तीय घाटे में शामिल नहीं किया जाना चाहिये। यह एक विशेष उद्देश्य ऋण है और जिसका राज्य सरकारों द्वारा अपने उद्श्य के लिये किये जाने वाले खर्चों से कोई सम्बन्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि एक अप्रैल, 2006 से अर्थोपाय के लिये ली जा रही अग्रिमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, इसलिये सुझाव है कि इन्हें तुरन्त संशोधित किया जाये तथा इसे उपभोक्ता मूल्य सूची के साथ जोड़ा जाये और हर दो वर्ष में स्वत: इसमें संशोधन होना चाहिये।
वर्षों से अनेक केन्द्रीय प्रायोजित योजनाएं बढ़ी हैं। इनके फण्डों को राज्य के समेकित फण्ड के माध्यम से नहीं भेजा जाता। राज्य स्तर पर केन्द्रीय सोसायटियों के गठन के कारण केन्द्रीय मंत्री सीधा फण्ड इन सोसायटियों को उपलब्ध करवाने पर बल देते हैं। उन्होंने अनुरोध किया कि राज्यों को केन्द्र सरकार के हिस्से के रूप में एक विशेष राशि आबंटित की जाये तथा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार राज्यों को योजनायें क्रियान्वयन की भी स्वतन्त्रता होनी चाहिये। उन्होंने केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं के पुन: संरचना पर गठित बी के चतुर्वेदी कमेटी की सिफारिशों को शीघ्रतिशीघ्र लागू किये जाने का भी अनुरोध किया।
जनसंख्या संशोधन पर मुखर्जी-गाडगिल फार्मूला को वरीयता देने की आवश्यकता है। बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की आय शर्त 25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत की जानी चाहिये। बेहतर वित्तीय प्रबन्धन वाले राज्यों को पुरस्कृत किया जाना चाहिये। उन्होंने कहा कि राज्य के सार्वजनिक उपक्रम का वित्तीय प्रबन्धन सीधा राज्यों के अधीन नहीं है, इससे भी राज्यों पर भार बढ़ रहा है। इन उपक्रमों के ऋण भी राज्य सरकारों से वसूले जा रहे हैं क्योंकि केन्द्रीय वित्त मंत्रालय ने राज्यों पर ऋण लेने की सीमा निर्धारित की गई है।
उन्होंने ईंधन पर सैस का हिस्सा केन्द्र सरकार से पूरा न मिलने का मुद्दा भी पुन: उठाया और कहा कि हरियाणा में सैस से लगभग 300 करोड़ रुपये वार्षिक संग्रहण होता है, जबकि केन्द्र हरियाणा को केवल 35 करोड़ रुपये ही दे रहा हैं। निर्धारित शर्तों के अनुसार ग्रामीण सडक़ सम्पर्कता के लिये 80 प्रतिशत फण्ड निर्धारित किया गया है तथा 20 प्रतिशत सडक़ों के अपग्रेडेशन के लिये निर्धारित है। जैसाकि हरियाणा में शत-प्रतिशत ग्रामीण सडक़ सम्पर्कता पहले ही है और राज्य को 80 प्रतिशत अपना हिस्सा भी नहीं दिया जा रहा।चूंकि ये सडक़ें काफी पुरानी हैं और उन्हें फिर से बनाये जाने की आवश्यकता है। इसलिये राज्य को कनैक्टिविटी हिस्से सहित इसका पूरा हिस्सा दिया जाना चाहिये।
उन्होंने कहा कि खाद्य सुरक्षा बिल आने से राज्यों पर इसके क्रियान्वयन की जिम्मेवारी बढ़ गई है। इसके लिये केन्द्र सरकार का वाजिब हिस्सा राज्यों को मिलना चाहिये। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 271 के अन्तर्गत सैस तथा सरचार्ज के माध्यम से किया गया राजस्व संग्रहण बढ़ा है परन्तु अनुच्छेद 270 के अन्तगर्त केन्द्र तथा राज्य के बीच नहीं वितरित किया जा रहा। केन्द्र सरकार का कुल कर राजस्व का हिस्सा वर्ष दर वर्ष बढ़ता जा रहा है और राज्यों के हिस्से पर इसका प्रतिकूल असर पड़ रहा है। केन्द्र सरकार को कुल कर राजस्व में अपना हिस्सा कम करने के दृष्टिïगत वर्तमान सैस तथा सरचार्ज की समीक्षा करनी चाहिये।