अंबाला कैंट 22 मार्चः कैंट के सनातन धर्म कॉलेज के सभागार में भारतीय राष्ट्रवाद में संगीत की भूमिका नामक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन प्राचार्य डॉ. देशबन्धु जी ने मुख्यातिथी तथा प्रतिभागियों का स्वागत किया। संगोष्ठी के प्रथम वक्ता के रूप में बोलते हुए डा. चमन लाल वर्मा शिमला विश्वविद्यालय ने कहा कि संगीत में नए-नए प्रयोग करना अच्छी बात है परन्तु संगीत को बिगाडऩा ठीक नहीं है। आजकल संगीत-चिकित्सा की बात बहुत की जाती है परन्तु वह अमेरिका से होकर भारत आता है जो बिल्कुल उस तरह है जैसे उल्टी गंगा पहाड़ पर चढ़ाना। डॉ. सुनीता शर्मा, प्राचार्या राजकीय महाविद्यालय, अम्बाला कैंट ने कहा कि आज के युवाओं में शास्त्रीय संगीत को सुनने या सीखने में कोई रूचि नहीं है अर्थात् वह रॉक-म्यूजीक को सुनना तथा सीखना चाहता है। इन्होंने कहा कि संगीत मनुष्य में आत्मविश्वास, आत्मबल भी लाता है। वह उसे जीवन में आगे बढऩे के लिए प्रेरित करता है। डॉ. सौभाग्यवर्धन ने कहा कि संगीत ने प्राचीन काल से हिन्दू तथा मुसलमान को मिलाया है। कई ऐसे हिन्दू हैं जिनके शिष्य मुसलमान हुए और कई मुसलमान उस्तादों ने हिन्दुओं को संगीत सिखाया है। संगीत का जन्म भारत में हुआ है तथा संगीत आज पूरे विश्व में सिखा तथा सिखाया जाता है। यह भारत के लिए गौरव की बात है। संगीत विभाग अध्यक्षा डा. परमजीत कौर ने संगोष्ठी के विषय का संयोजन करते हुए कहा कि यह विषय अपने आप में इतना महान है कि इस पर जितनी चर्चा की जाए उतनी कम है, संगीत हम सब को राष्ट्र प्रेम की भावना से ओत-प्रोत कर देता है।
हरविन्द्र शर्मा, प्राचार्या राजकीय महिला महाविद्यालय पंचकूला ने विषय पर गहन चर्चा की तथा बताया कि संगीत समाज, समुदाय, देश तथा पूरे विश्व को जोडऩे का काम करता है। इन्होंने सितारवादन करते हुए हे राम हे राम नामक भजन से सभी श्रोताओं को भाव-विभोर किया तथा विश्वबन्धुत्त्व की भावना को बढ़ावा दिया। विशेष अतिथि डा. भारती बन्धु प्राचार्या आर्य कन्या महाविद्यालय, शाहबाद ने कहा कि मध्यकालीन भारत के समय में काव्य की भूमिका से राष्ट्रप्रेम को स्पष्ट किया। जाने-माने सूफी गायक श्री बरकत सिद्घू जी ने अपनी करिश्माई प्रस्तुति से पूरे सभागार को सूफी संगीत की लय में बहने पर मजबूर किया तथा सब श्रोताओं को झूमने के लिए विवश किया। कार्यक्रम के अन्त में संगीत विभाग की डा. मधु शर्मा ने विभिन्न क्षेत्रों से आए अतिथियों तथा प्रतिभागियों का धन्यवाद किया और कहा कि इस तरह की संगोष्ठी से संगीत जिसकी अपनी कोई भाषा नहीं है परन्तु एक भाव व विचार पैदा होता है जो अपने आप में राष्ट्रीयवाद को पैदा करता है। इस संगोष्ठि में हेमराज तथा प्रवीण राठी का विशेष योगदान रहा।