चंडीगढ़ - हरियाणा-पंजाब के वर्षों से लंबित मसलों को सुलझाने के लिए चल रहे प्रयास महज राजनीतिक स्टंट साबित हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे के बाद दोनों राज्यों के बीच दशकों से छिड़े विवाद सुलझने की बजाए ठंडे बस्ते में चले गए हैं। पंजाब के अडिय़ल रवैये के कारण दोनों राज्यों के अधिकारियों के बीच मई माह के दौरान होने वाली बैठक आजतक नहीं हो सकी है। पंजाब के विस्तार के बाद अस्तित्व में आए हरियाणा की स्थापना के साथ ही इसके पानी की समस्या शुरू हो गई थी। पिछले पचास वर्षों से हरियाणा अपने हिस्से का पानी पंजाब से मांग रहा है।
पंजाब इस मामले में शुरू से ही अडिय़ल रूख अपना रहा है। दोनों राज्यों के बीच एसवाईएल को लेकर छिड़ा विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। इस बीच कई बार केंद्र व राज्यों में एक ही दल की सरकारें बनी लेकिन विवाद सुलझने की बजाए उलझता रहा। हरियाणा को इस समय 81 लाख एकड़ फुट अतिरिक्त पानी की जरूरत है। एसवाईएल की तरह ही घग्गर नदी के पानी के बंटवारे को लेकर भी दोनों राज्यों में विवाद चल रहा है।
इसके अलावा दोनों राज्यों के बीच राजधानी चंडीगढ़ पर दावे को लेकर विवाद शुरू हो गया था। दोनों राज्य शुरू से ही राजधानी चंडीगढ़ पर एक-दूसरे के मुकाबले अपना दावा मजबूत बता रहे हैं। चंडीगढ़ पर दावे के साथ-साथ पंजाब मोहाली को तो हरियाणा पंचकूला को मिनी राजधानी के रूप में विकसित कर रहा है। दोनों राज्यों की राजधानी के साथ-साथ हाईकोर्ट भी एक ही है। जिसके चलते हरियाणा कई वर्षों से अलग हाईकोर्ट की मांग कर रहा है। पिछले साल हरियाणा में सत्ता परिवर्तन के बाद इन विवादों को सुलझाने की तरफ प्रयास करते हुए केंद्र सरकार के निर्देशों पर दिसंबर माह के दौरान पंजाब व हरियाणा के अधिकारियों की संयुक्त बैठक हुई। इस बैठक में घग्गर नदी जल विवाद के अलावा पानी से जुड़े अन्य विवादों को सुलझाने की दिशा में बात हुई।