शिमला - हिमाचल के चार सौ से ज्यादा गांवों में नशे का कारोबार खूब फलफूल रहा है। इन गांवों में पिछले कई सालों से लोग खुलेआम नशीले पदार्थों की खेती कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि नशीले पदार्थों की खेती के इस अवैध धंधे के लिए अधिकतर मामलों में सरकारी जमीन का इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकारी भूमि पर की जाने वाली अवैध खेती का एक फायदा यह रहता है कि अचानक छापा पडऩे पर जमीन के मालिक के तौर पर किसी को फंसाया नहीं जा सकता।
खेती करने वाले लोग पल्लू झाडक़र एक तरफ खड़े हो जाते हैं और पुलिस के पास खेती को नष्ट करने के अलावा दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई ठोस सबूत नहीं बचता। मुख्यमंत्री ने नशे के धन्धे में संलिप्त लोगों पर शिकंजा कसने के लिए पुलिस अधिकारियों के एक समर्पित दल के साथ अलग पुलिस अधीक्षक कार्यालय आरम्भ करने का सुझाव दिया। वीरभद्र सिंह आज प्रदेश में नशाखोरी की समस्या से निपटने के लिए उठाये गये कदमों की समीक्षा के लिए आयोजित बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि नशे के कारोबार या इस तरह की किसी गतिविधि की सूचना देने वाले व्यक्ति को पुरस्कृत किया जायेगा।
मलाणा में पैदा होने वाली चरस की कीमत ढाई लाख रुपये प्रति किलो से ज्यादा रहती है। अंतराष्ट्रीय बाजार में मलाणा क्रीम के नाम से बिकने वाली इस चरस की भारी मांग रहती है। इंटरनेट पर इस चरस का खूब प्रचार-प्रसार हो रहा है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो का मानना है कि 60 प्रतिशत के करीब नशीले पदार्थ सरकारी जमीनों पर ही उगाये जा रहे हैं। यह खेती कुल्लू मनाली, चम्बा, मण्डी, सिरमौर और शिमला जिलों में हो रही है।