चंडीगढ़,3 फरवरी- क्या बिना ब्रश के पेंटिंग संभव है? जी हां बिल्कुल । यदि कोई शक है तो 27वें सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला में आकर देख लीजिए। मेला के जोन नंबर सात की 742 वीं स्टाल पर दिल्ली की हरजीत कौर पेंटिंग की दुनिया में एक अपवाद हैं। आम तौर पर जहां पेंटर या कलाकार ब्रश से पेंटिंग करके अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं,वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.कॉम की शिक्षा हासिल करने के बावजूद भी हरजीत बिना ब्रश के अपनी कल्पनाओं को शीशे के सामान पर उकेर रही हैं। कहते हैं कि शौक के आगे सब हार जाते हैं। हरजीत के साथ भी ऐसा ही हुआ,पति और घर के अन्य लोग चाहते थे कि हरजीत भी चार्टेड अकांऊटेंट पति के साथ ही उसके काम में हाथ बंटाए। परंतु हरजीत के जुनून के आगे सब नतमस्तक हो गए और उसको फ्री-हैंड कर दिया।
अपनी स्टाल के बाहर सिंपली गलासिक ब्रांड नेम की नाम-पट्टिका पर भी उन्होंने सूरजकुंड के सूरज को इतने कलात्मक ढंग से उकेरा है कि वहां से गुजरने वाले हर पर्यटक के कदम बरबस ही रूक जाते हैं। सूरजकुंड के अलावा पिछले 11 साल से पंजाब,चंडीगढ,जयपुर जैसे शहरों में अब तक हरजीत कौर 85 प्रदर्शनियों में अपने हूनर को प्रदर्शित कर चुकी हैं। इस हस्तशिल्पी का दावा है कि भारत में शीशे के ऊपर बिना ब्रश के रंगों से चित्रकारी की कला करने वाली वह एकमात्र कलाकार है। अपनी कला को ही साधना मानने वाली हरजीत के अनुसार वह टे्र,कैंडल होल्डर,हैंगिंग लाइटस,मेकअप-मिरर,गलाश-विंडोज,गलाश-डोर,वाजिज इत्यादि वस्तुओं पर इंपोरटिड रंगों से अपनी रचनात्मकता को अंजाम तक पहुंचाती हैं। शीशे की वस्तुओं पर उकेरी गई हर कलाकारी कहीं से नकल करने की बजाए हरजीत की अपनी सोच व कल्पनाओं पर आधारित होती है। स्कूली समय से ही ड्राईंग में रूचि रखने वाली इस महिला कलाकार की पेंटिंग 150 रूपए से लेकर 25 हजार रूपए तक की कीमत की होती हैं। हॉबी के रूप में वर्ष 1999 से सिंपली गलासिक का कार्य करने वाली इस शिल्पी ने अपने शौक के आड़े आने वाली हर बाधा को जीत कर अपने नाम हरजीत को सार्थक कर दिया। इनकी कला का अनूठा पहलू यह है कि शीशे पर बहते रंगों को रोकना और इन रंगों को कला का रूप देना किसी अचरज से कम नहीं। उन्होेंने बताया कि पहले शीशे की वस्तु पर गाढ़े रंग से डिजाईन की बाहरी रेखाएं खिंची जाती हैं। जब 20-25 मिनट में यह सूख जाती हैं तो रंग से भरी शीशी से ध्यानपूर्वक रंगों को उस वस्तु पर धीरे-धीरे उड़ेला जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान इतने ध्यान की जरूरत होती है,जितना कि एक साधक ध्यान-योग के समय अपनी इंद्रियों को साधता है।
क्या इस सिंपली-गलासिक को आपने व्यवसाय के रूप में चुना है? इस सवाल पर मुस्कराकर हरजीत कहती हैं कि अभी तक वह इस काम को मात्र शौक के रूप में रखे हुए हैं,वह चाहती तो हैं इसको परमोट करना, परंतु बड़े ही ध्यान से। घर पर ही अपनी कला को निखार रही हरजीत को अभी तक कोई अवार्ड न मिलने का मलाल अवश्य है,परंतु साथ ही यह भी कहती हैं कि हर प्रदर्शनी में उनकी कला को पर्यटक बेइंतहा पसंद करते हैं,यही लोगों का प्यार उनके लिए अवार्ड है।
हरजीतकौर सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेला को हस्तशिल्पियों के लिए सबसे बड़ा प्लेटफार्म मानती हैं। वह केंद्र सरकार व हरियाणा सरकार की इस बात के लिए सराहना करती है कि उनके जैसे शौकिनों या कलाकारों को इतने बड़े मेले में अपने हूनर को लाखों लोगों तक पहुंचाने का मौका दिया है।