आपसी दुश्मनी व बैर मिटाने का पर्व होली का स्वरूप आज बदल गया है। आज यह हुड़दंग व महिलाओं के साथ छेड़खानी करने का पर्व बन गया है। आखिर क्या वजह है इस बदलाव की?
‘होली है, बुरा न मानो होली है’, ऐसी आवाजें होली के दिन निकलते ही सुनाई पड़नी शुरू हो जाती हैं। स्त्री, पुरुष, युवक, युवतियां, बच्चे, बूढ़े, टोलियां बनाकर पिचकारियों से रंग उछालते हुए, गुलाल हवा में बिखेरते हुए दिखाई दे जाते हैं।
होली की प्राचीन परंपरा
होली की परंपरा उतनी ही प्राचीन है जितनी कि भारतीय सभ्यता। ग्रंथों में भी होली का विवरण मिलता है। प्राचीन काल में खेली जाने वाली होली और जिस रूप में होली आज खेली जाती है इसमें काफी अंतर आ गया है। आज केसर व टेसू के फूल के रंगों आदि को कोई नहीं पूछता। आज जमाना आ गया है कीचड़ का, मिलावटी रंगों का। आज होली मिलन पर्व और पुरानी दुश्मनी का गला घोंटकर नई शुरूआत करने की इच्छा से नहीं खेली जाती, बल्कि होली की आड़ लेकर पुरानी दुश्मनी चुकाने की फिराक में रहने वाले इस मौके पर चूकते नहीं हैं। आज होली खेली जाती है युवतियों को तंग करने के लिए। हुल्लड़बाजी करना ही होली खेलना बन गया है। शराब की बोतल हाथ में लेकर व भांग के नशे में झूमते हुए युवक और पुरुष दिखाई देते हैं। ऐसे मनचले होली की मस्ती में अपनी सुध बुध भूलकर युवतियों की तलाश में रहते हैं तथा उनके साथ छेड़खानी करते हैं। उनके पास तो ऐसे रंग होते हैं जो कई महीनों तक छूट ही नहीं पाते हैं और साथ ही महिलाओं की कोमल त्वचा को भी प्रभावित करते हैं। गुब्बारों में पानी भरकर राहगीरों पर उछालना बच्चों का खेल माना जाता है पर अब तो बड़े भी बच्चों के रास्ते पर चलने लगे हैं। यद्यपि यह खेली मस्ती के आलम में जाती है, लेकिन कभी-कभी मस्ती का आलम दंगे में भी परिवर्तित हो जाता है। बदलता स्वरूप होली का त्यौहार आपसी दुश्मनी, ईर्ष्या का त्याग करने का संदेश लेकर आता है लेकिन देखा यह गया है कि होली को मिलन पर्व न मानकर हुल्लड़बाजी का पर्व माना जाने लगा है।
देवर भाभी अथवा जीजा साली उन्मुक्त होकर होली खेलते हैं। देवर की यह इच्छा रहती है कि वह भाभी को खूब छकाएगा और जीजा भी ऐसे रंगों की तलाश में रहता है जो लगा दे तो जल्दी छूटे ही नहीं ताकि उसकी साली को उसकी याद काफी दिनों तक सताती रहे। ऐसे लोग अपने मन की खुशी के लिए ऐसे पक्के रंग चेहरे पर लगा देते हैं जो चेहरे की कोमल त्वचा को प्रभावित करते हैं और जिनकी वजह से उनका खूबसूरत चेहरा काफी दिनों तक बदसूरत बना रहता है।
सतर्कता आवश्यक
महिलाएं जो कि अपने सौंदर्य के प्रति सजग रहती हैं, उन्हें होली पर अपने ऊपर डाले गए रंगों की ओर से सतर्क रहना चाहिए। गुलाल में मिलावट होती है। रंगों में ऐसे-ऐसे रसायन मिलाए जाते हैं जो विषैले होने के साथ त्वचा की कोमलता को भी नष्ट करते हैं। जहां तक हो सके, युवतियों को ऐसे रंगों से बचना चाहिए। लेकिन बच पाना संभव कहां होता है। होली की मस्ती में चूर लोग रंग डालने से चूकते नहीं हैं, ऐसी स्थिति में गुलाल, रंग आदि को किसी के कपड़े से तुरंत साफ कर लेना चाहिए। कुछ लोग पानी से भिगोने वाले रंगों को अपने हाथ में लगाकर युवतियों के चेहरे पर मल देते हैं। ऐसी स्थिति में इन रंगों को कभी सूखने मत दें।
प्राचीन ग्रंथों से संकेत मिलते हैं कि होली के दिन दोपहर तक होली का रंग खेला जाता था और फिर सब लोग एक जगह एकत्र होकर गीत संगीत का आनंद लेते थे।
हुड़दंग का पर्याय
होली के दिन लोग घर-घर जाकर गुलाल लगाते हैं, रंगों की पिचकारियां छोड़ते हैं। इस तरह होली के दिन आने जाने वालों का तांता लगा रहता है। कहीं-कहीं तो मेहमान का स्वागत पानी की बाल्टी उड़ेलकर किया जाता है।
ऐसे मनाएं
माना कि होली उल्लास, उमंगों से भरा त्यौहार है और इसका भरपूर आनंद भी उठाया जाना चाहिए। लेकिन जिस अंदाज में होली खेली जाती है यदि उसमें परिवर्तन कर लिया जाए तो होली का आनंद कुछ और ही होगा। होली के दिन से पहले ही यदि मुहल्ले के लोग एकजुट होकर यह निर्णय कर लें कि होली पर घर-घर न जाकर मुहल्ले में किसी एक सार्वजनिक स्थान पर होली खेली जाए, वहीं मिठाइयों का आदान-प्रदान किया जाए, गले मिलकर पुरानी दुश्मनी को भुलाया जाए तो होली का आनंद बहुत बढ़ जाएगा। मुहल्ले वाले मिलकर गीत गानों का भी आयोजन कर सकते हैं।
ऐसी व्यवस्था निश्चित तौर पर साफ सुथरी व्यवस्था होगी। महिलाएं जो मुहल्ले के युवकों के ‘गुब्बारों’ और बाहरी लोगों की छेड़खानियों का शिकार बनती हैं, उनसे बच सकती हैं।