चंडीगढ़ (संजीव शर्मा )- राजनीतिक में कब क्या हो जाए कोई इसका अंदाजा नहीं लगा सकता। हरियाणा की सत्तारूढ़ कांग्रेस में मंगलवार को बड़ी तेजी से घटनाक्रम बदला। मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने आज विधानसभा सचिवालय में अंबाला की सांसद एवं केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा का राज्य सभा सदस्य के रूप में नामांकन दाखिल करवाया। हुड्डा खेमा शुरू से यह नहीं चाहता था कि कुमारी सैलजा राज्यसभा में जाएं। इसके बावजूद सैलजा ने खुद को हैवी वेट साबित करते हुए पूरे खेल को नया मोड़ दे दिया।
बीते छह महीने के दौरान हरियाणा के राजनीतिक परिदृश्य पर अगर नजर दौड़ाई जाए तो एक बात साफ है कि सार्वजनिक मंचों पर मुख्यमंत्री का विरोध करने वाले राज्यसभा सांसद बीरेंद्र सिंह डूमरखां जहां शांत बैठे हुए हैं वहीं कुमारी सैलजा मुख्यमंत्री के खिलाफ लगातार झंडा उठा रही थी। सबसे पहले मुख्यमंत्री पर क्षेत्रवाद की राजनीति का आरोप लगाने वाली कुमारी सैलजा ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के समय भी मुख्यमंत्री हुड्डा की खुलेआम विरोधता की थी। यही नहीं पिछले दिनों अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक के दौरान हरियाणा की तरफ से केवल कुमारी सैलजा तथा सिरसा के सांसद अशोक तंवर को बोलने का मौका दिया गया। जिसके कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे थे।
अब राज्यसभा सांसद के चयन के समय भी मुख्यमंत्री हुड्डा खेमा जहां कांग्रेस अध्यक्ष फूलचंद मुलाना तथा वरिष्ठ नेता राजकुमार वाल्मीकि का नाम चला रहा था वहीं कुमारी सैलजा की पहली पसंद सांसद ईश्वर सिंह को दोबारा राज्य सभा में भेजना या उनके स्थान पर वह खुद जाना चाहती थी। कुमारी सैलजा पिछले छह महीने से लगातार इस बात के संकेत दे रही थी कि वह अब केंद्र की बजाए हरियाणा की राजनीति में अधिक समय देंगी।
बीती 23 जनवरी को मुख्यमंत्री तथा कांग्रेस अध्यक्ष फूलचंद मुलाना जब चंडीगढ़ में मीडिया से रूबरू हुए तो वह इस बात को लेकर बेहद आशान्वित लग रहे थे कि उनकी सहमती से ही राज्यसभा में प्रत्याशी जाएगा। बताया जाता है कि दिल्ली दरबार में 26 जनवरी के बाद कहानी बदलनी शुरू हो गई। कांग्रेस हाईकमान सैलजा को राज्यसभा में भेजने के लिए तैयार हो गई।
बीती रात कुमारी सैलजा ने केंद्रीय मंत्रीमंडल से इस्तीफा देकर इन आशंकाओं को और प्रबल कर दिया है कि वह आने वाले चुनाव में हुड्डा खेमे के खिलाफ काम कर सकती हैं। सैलजा की योजना आने वाले दिनों में हरियाणा में सक्रिय होने की है। जिसके चलते उन्होंने अंतिम समय में ईश्वर सिंह की बजाए खुद को हाईकमान के समक्ष बतौर दावेदार पेश कर दिया। हाईकमान के आदेशों को मुख्यमंत्री हुड्डा भी नहीं नकार सके।