चण्डीगढ़ - चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के वैज्ञानिकों ने मूंग की एक नई किस्म एमएच-421 विकसित की है। उत्पादन तथा रोग प्रतिरोधकता की दृष्टि से यह एक उत्तम किस्म है। देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में इसकी खेती की जा सकती है।
कुलपति डॉ. के.एस. खोखर ने यह जानकारी देते हुए बताया कि केवल 60 दिन में पककर तैयार होने वाली मूंग की यह एमएच-421 किस्म मूंगबीन येलो मोसेक वायरस रोग के प्रति रोधक है। बसन्त व ग्रीष्मकाल में यह 10-12 क्ंिवटल प्रति हैक्टेयर औसत पैदावार देती है। उन्होंने कहा इस किस्म के दाने चमकीले व मध्यम आकार के होने के कारण मोटे दानों वाली किस्म की अपेक्षा किसानों को इसके ज्यादा भाव मिल सकते हैं। उन्होंने कहा शीघ्र पकने की विशेषता के कारण यह धान-गेहूं फसल-चक्र के लिए बहुत उपयुक्त किस्म है तथा इस किस्म की सरसों, जौ, आलू व गन्ना के पश्चात भी बिजाई की जा सकेगी।
डॉ. खोखर ने बताया कि सैंट्रल सब-कमेटी ऑन क्रॉप स्टैंडर्डज़, नोटिफिकेशन एंड रिलीज़ ऑफ वैराइटीज़ ऑफ एग्रीकल्चरल क्रॉप्स ने इस किस्म की विशेषताओं के दृष्टिगत इसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तराखंड के समतल क्षेत्रों में बसन्त व ग्रीष्म ऋतु में बिजाई के लिए अनुमोदित किया है।
विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. एस.एस. सिवाच के अनुसार देश में दलहनों की कम उत्पादकता तथा अत्यधिक कीमतों को देखते हुए विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक दलहनों की उन्नत तथा विभिन्न जलवायु के अनुकूल किस्में विकसित करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं। उन्होंने बताया कि मूंग की यह किस्म अनुवांशिकी एवं पौध प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों डॉ. राम कुमार यादव, राजेश यादव व आर.एस. वाल्दिया द्वारा विकसित की गई है। इसमें डॉ. नरेश कुमार, राकेश कुमार, जे.एस. यादव, एम.एस. सांगवान व रोशन लाल का भी महत्वपूर्ण योगदान है।