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उपराष्ट्रपति ने ओपी जिंदल ग्लोबल विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का किया उद्घाटन

Updated on Friday, October 11, 2013 14:54 PM IST

चंडीगढ़ - भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा है कि नागरिकों से संबंधित नीतियों के निर्धारण और क्रियान्वयन में नागरिकों की पर्याप्त भागीदारी होनी चाहिए।

वे आज सोनीपत में ओपी जिंदल ग्लोबल विश्वविद्यालय में ‘संघवाद बनाम स्थानीयवादः मांगों एवं परस्पर विरोधी आकांक्षाओं की होड़’ विषय पर आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करने के उपरांत वहां उपस्थित लोगों को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि संघीय ढांचे में लचीलापन, सहयोग, सहिष्णुता तथा राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को स्वीकार करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नागरिकों से संबंधित महत्वपूर्ण फैसलों में उनकी भूमिका होनी चाहिए। ऐसा न होने पर उग्र राष्ट्रवाद पनपता है और विविधता में एकता की अवधारणा को नुकसान पहुंचता है।

       अंसारी ने कहा कि  पिछले 25 वर्षों में संघीय प्रणाली के महत्वपूर्ण पहलुओं पर के बारे में तीन अवसरों पर समीक्षा की गई - 1988 में सरकारिया आयोग, 2002 में वैंकटचलैया आयोग और 2010 में पुंछी आयोग ने शक्तियों के विकेन्द्रीकरण पर अपने विचार दिए और कहा कि पंचायतों और नगरपालिकाओं को स्वायतशासी बनाने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति के साथ-साथ और अधिकार देने की आवश्यकता है।

हरियाणा के मुख्य मंत्री भूपेन्द्र सिंह ने सम्मेलन के शुभारंभ सत्र में बोलते हुए कहा कि केन्द्र और राज्यों को समस्त राष्ट्र के हित के लिये मिलकर कार्य करना चाहिए। संघीय व्यवस्था में राज्यों को विकास के पथ पर प्रगति करने में सक्षम बनाने के लिये केन्द्र द्वारा राज्यों के कार्यों में हस्तक्षेप न करना और साथ ही केन्द्र से पूर्ण सहयोग एवं समन्वय की आवश्यकता है। उन्होंने विकेन्द्रीकरण एवं स्थानीय प्रशासन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि ये लोकतंत्र के महत्वपूर्ण पहलू हैं। विकेन्द्रीकरण यह सुनिश्चित करता है कि एक राजनीति स्तर या संस्था के हाथों में ही सत्ता सीमित न हो। यह राज्यों को विकास करने और विकास के लिये अपने ऐसे पथ का अनुसरण करने की अनुमति भी प्रदान करता है जो उनकी स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुकूल हों।

मुख्य मंत्री ने कहा कि भारत आकार और जनसंख्या दोनों मामलों में एक बड़ा देश है। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे संविधान निर्माताओं ने देश के शासन के लिये संघवाद के सिद्घांत को अपनाने का निर्णय लिया।  उन्होंने कहा कि भारत संघीय राज्य व्यवस्था को एक साथ धारण करने के मुख्य उदाहरणों में शामिल है, जिसमें केन्द्र के पास देश को एकजुट रखने की महत्वपूर्ण भूमिका है। हमारे संघवाद के बुनियादी सिद्घांत लगातार समान रहे हैं। बहरहाल, यह अपने घटकों के बीच शक्तियों के वितरण की वास्तविक प्रकृति के बारे में अपने विवरण के संदर्भ विकसित करता रहा है। हमारे संविधान निर्माता डॉ0 बी आर अम्बेडकर ने यह सही माना कि कठोरता हमारे संघवाद की एक गंभीर कमजोरी होगी।

हुड्डा ने कहा कि आमतौर पर संघवाद को क्षेत्र आधारित बहुलवाद की स्थिति में सत्ता को बांटने के एक तंत्र के रूप में लिया जाता है। क्षेत्रीय रूप से अभिज्ञेय संस्कृति या अन्य विविधताओं वाले समाज के लिये यह एक आदर्श राजनीतिक व्यवस्था है। इस प्रकार, यह स्वतंत्र लोकतांत्रिक इच्छा के माध्यम से सत्ता में भागीदारी के लिये अलग-अलग क्षेत्रीय व्यवस्थाओं के बीच एक व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि यदि कभी भी यूरोप एक संघीय इकाई बनता है तो वह इस प्रकार के संघवाद का एक उत्कृष्ट मामला होगा जिसका कि उन्होंने अभी उल्लेख किया है।

उन्होंने कहा कि बहरहाल, हमारा बहुलवाद क्षेत्र आधारित नहीं है। हमारी विविधता प्रादेशिक इकाइयों तक सीमित नहीं है और एक मायने में यह हमारी सबसे बड़ी ताकत और हमारी राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को जोड़ने वाली एक महान शक्ति है। हमारे देश की विविधता इसके क्षेत्रीय विभाजन को अतिच्छादित नहीं करती।  अतः हमारी विविधता एक विभाजनकारी शक्ति नहीं बनी है। हमारे मामले में एकता का तात्पर्य एकरूपता या अनुरूपता नहीं है बल्कि यह विभिन्न प्रकार की विविधताओं को सम्मिलित करती है। हुड्डा ने कहा कि देश को अपने स्वयं के शासन तंत्र के साथ विभिन्न राज्यों में विभाजित करने के साथ-साथ हमारे संविधान में एक मजबूत केन्द्र भी प्रदान किया।

हुड्डा ने कहा कि हरियाणा को वर्ष 1966 में राज्य का दर्जा मिला। इससे पूर्व, हरियाणा पंजाब राज्य का एक हिस्सा था। हरियाणा को राज्य का दर्जा मिलने के बाद प्रदेश ने त्वरित प्रगति की। निवार्चित सरकार ने हरियाणा के विकास के लिये महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित किया। वर्ष 1966-67 में राज्य का योजनागत बजट मात्र 27 करोड़ रुपये था, और अब वर्ष 2013-14 में राज्य का योजनागत बजट बढ़कर 26,000 करोड़ रुपये के अदभुत आकंड़े तक पहुंच गया है।

उन्होंने कहा कि बड़ी मात्रा में उपजाऊ भूमि के साथ एक स्थल सीमित राज्य होने के नाते, हरियाणा कृषि विकास और देश के प्रमुख कृषि राज्यों में से एक बनने पर ध्यान केन्द्रित कर सका है। साथ ही, हरियाणा ने स्वयं को एक औद्योगिक राज्य के रूप में भी विकसित किया है और बड़ी संख्या में भारतीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को राज्य में अपने कार्यालय एवं निर्माण इकाइयां स्थापित करने के लिये आकर्षित किया है। राज्य की उद्योग अनुकूल नीतियों, सुदृढ़ बुनियादी ढ़ाचें और अनुकूल भौगोलिक स्थिति जैसे विभिन्न कारकों ने बड़े पैमाने पर राज्य की मदद की है।

उन्होंने कहा कि संघीय व्यवस्था के कारण हरियाणा प्रदेश को अपनी क्षमता का दोहन करने और अपनी अनूठी नीतियां बनाने का अवसर मिला है ताकि प्रदेश का चहुंमुखी विकास सुनिश्चित हो सके। हुड्डा ने कहा कि साथ ही भारत की एकता एवं अखण्डता को बनाये रखना हमारे लिये सबसे बड़ी चिंता का विषय है। केवल संविधान का मसौदा तैयार करने के समय ही यह महत्वपूर्ण विषय नहीं था बल्कि आज भी उतना ही प्रासंगिक है जिसेकि देश के विभिन्न भागों में अलग राज्य की मांग के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे परस्पर विरोधी विचारों के बीच राज्यों और केन्द्र के बीच सत्ता का कैसे संतुलित विभाजन किया जाये, यह एक चुनौती भरा कार्य है।

हुड्डा ने कहा कि राज्य स्तर पर शासन के अलावा, नगर निकायों तथा पंचायतों जैसी संस्थाओं द्वारा स्थानीय प्रशासन संघवाद का एक अन्य पहलू है। जहां स्थानीय स्वशासन वांछनीय एवं सशक्त बनाने के लिये है वहीं इसमें विभिन्न चुनौतियों के समाधान भी शामिल है। एक स्थानीय निकाय को पर्याप्त शक्तियों के साथ एक वैध स्वशासन संस्थान के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए ताकि समाज के सभी वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।

मुख्यमंत्री ने भारत के उपराष्ट्रपति हामिद असांरी का हरियाणा आने के लिये धन्यावाद किया। उन्होंने यह महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन आयोजित करने के लिए ओ पी जिन्दल ग्लोबल यूनिवर्सिटी तथा विशेष रूप से इसके युवा एवं ओजस्वी कुलाधिपति नवीन जिंदल तथा कुलपति प्रोफेसर सी राज कुमार को बधाई दी। उन्होंने इस सम्मेलन की सफलता की भी कामना की, जिसमे राजकोषीय संघवाद तथा सत्ता बांटने में राज्यों एवं केन्द्र की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार मंथन करने के लिये उचित अवसर प्रदान किया है।

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