नई दिल्ली - सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए वित्त वर्ष 2014-15 भी कोई राहत लेकर नहीं आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद भी बैंकों के मुनाफे को तगड़ी चपत लगी है। कुछ बैंक तो ऎसे हैं जिन्होंने 14 साल में पहली बार घाटे का मुंह देखा। इतना ही नहीं, भारतीय बैंकिंग प्रणाली के इतिहास में पहली बार वित्त वर्ष 2014-15 में 13 निजी क्षेत्र के बैंकों का शुद्ध मुनाफा कुल 25 सरकारी बैंकों के मुनाफे से आगे निकल गया है।
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल लिमिटेड ने चेताया कि भारतीय बैंकों के बही-खाते में फंसे कर्ज का आंकड़ा बढ़ सकता है। बैंकर्स भी अर्थव्यवस्था की धीमी गति को इसका जिम्मेदार बताया। बढ़े इंफास्ट्रक्चर लोन लगातार फंसे कर्ज की श्रेणी में जा रहे हैं। कर्नाटक बैंक ने आधार दर 0.25 फीसदी घटाई सार्वजनिक क्षेत्र के कर्नाटक बैंक ने अपने आधार दर (यानि न्यूनतम ऋण दर) में 0.25 फीसदी की कटौती की है।
बैंक ने बताया कि उसने आधार दर 10.75 प्रतिशत से घटाकर 10.50 फीसदी कर दी है। नई दर 1 जून से प्रभावी होगी। उसने कहा है कि इससे आधार दर पर आधारित सभी ऋणों पर ब्याज 0.25 प्रतिशत कम हो जाएगा तथा खुदरा ग्राहक, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम ग्राहक तथा निर्यातकों पर ईएमआई का बोझ कम होगा। सरकारी बैंकों का बुरा हाल बैंक ऑफ इंडिया ने मार्च 2001 के बाद पहली बार वित्त वर्ष 2014-15 की चौथी तिमाही में नुकसान देखा। जनवरी से मार्च तिमाही में बैंक को 56.14 करोड़ रूपए का शुद्ध नुकसान हुआ।
इससे पहले 2001 की मार्च तिमाही में बैंकों को 30.24 करोड़ रूपए का घाटा हुआ था। यूनियन बैंक से लेकर बैंक ऑफ इंडिया को घाटा हुआ है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का मुनाफा चौथी तिमाही में सालाना आधार पर 23 फीसदी घटकर 443.77 करोड़ रूपए पर पहुंच गया। मुनाफे में गिरावट फंसे कर्ज के लिए ज्यादा प्रोविजनिंग करने की वजह से आई है। यूको बैंक पर पुराने रीस्ट्रक्चर्ड लोन का दबाव दिखा। प्रोविजनिंग ज्यादा होने की वजह से बैंक का परिचालन मुनाफा, कुल आय में गिरावट आई है जबकि ग्रॉस एनपीए में इजाफा आया है। केनरा बैंक की ब्याज आय 1.9 फीसदी घटी है। इसके अलावा, तिमाही आधार पर चौथी तिमाही में ग्रॉस एनपीए बढ़कर 13,040 करोड़ रूपए रहा।