मुंबई - यूं तो त्योहारों के इस सप्ताह में हिन्दी की चार फिल्में रिलीज हुई हैं, लेकिन इनमें से ‘इक्कीस तोपों की सलामी’पर बात करना ही समय का सदुपयोग होगा। हालांकि यह ऑफबीट फिल्म कही जा रही है, लिहाजा यंगस्टर्स इसे हाथों हाथ लेंगे ये कहना थोड़ा मुश्किल है। फिर भी कलाकारों और निर्देशक रवींद्र गौतम ने एक कोशिश की है कि लोग उनकी फिल्म देखें। फिल्म का कथानक है कि एक इंसान ने मरने से पहले अपनी आखिरी ख्वाहिश अपने परिवार वालों को बताई, तो सभी सकते में आ गए।
कहानी कुछ इस तरह है कि पुरुषोत्तम नारायण जोशी (अनुपम खेर) एक सरकारी नौकर है और अपना काम ईमानदारी से करते हैं। उनके दो बेटे शेखर जोशी (मनु ऋषि चड्ढा) और सुभाष जोशी (दिव्येंदु शर्मा) हैं। इन दोनों की अपने पापा से वैचारिक मतभेद रहते हैं। रिटायरमेंट के बाद जोशी जी पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। सरकारी विभागों का भ्रष्टाचार उनसे बर्दाश्त नहीं होता और वह बीमार रहने लगते हैं। एक दिन जोशी जी की मृत्यु हो जाती है।
उनकी मौत के बाद उनके बेटों को अहसास होता है कि उनके पिता जिस सम्मान के हकदार थे, वह सम्मान उन्हें मिला नहीं। फिर वह अपने पिता की उस अंतिम इच्छा को पूरी करने की जद्दोजहद में लग जाते हैं, जिसमें उन्होंने इक्कीस तोपों की सलामी की इच्छा जतायी थी। शेखर और सुभाष दोनों इस मुहिम में जुट जाते हैं और ऑनलाइन शॉपिंग पर तोप भी ढूंढ़ लेते हैं। दरअसल यही फिल्म की यूएसपी है कि दोनों बेटे इस मॉडर्न जमाने में अपने पिता को इक्कीस तोपों की सलामी देने के लिए क्या-क्या करते हैं। डायरेक्टर रवींद्र गौतम ने पूरी ईमानदारी से काम किया है, बिल्कुल पुरुषोत्तम जोशी के किरदार की तरह। नेहा धूपिया ने भी बेहतरीन अभिनय की है। फिल्म का संगीत दिया है राम संपत ने, जिनके संगीत में फिल्म का एक गाना ‘घूर-घूर के’पहले ही हिट हो चुका है। कुल मिलाकर तमंचे, स्पार्क जैसी फिल्मों के बीच एक गंभीर संदेश देती फिल्म देखना अच्छा विकल्प है, बशर्ते उम्मीद की जा सकती है कि फिल्म हर वर्ग को पसंद आयेगी।