मैं दूध के पैकेट लेने दुकान के सामने खड़ा था। वह मिठाई भी बेचता था। शो केस में ललचाती लुभाती मिठाइयां सजी हुई थीं। इतने में एक रेहड़ी वाला आया। उसने दुकानदार से कहा कि पांच रुपये के रसगुल्ल् दे दो। नोट उसने दस का बढ़ाया। दुकानदार मेरे दूध के पैकेट देते ऊंचे स्वर में सबको सुनाते चिल्लाया-पांच रुपये के रसगुल्ले आते हैं क्या? लने हैं तो दस के ले ले।
रेहड़ी वाले ने कहा कि यों ही दुकान के आगे से निकल रहा था, सोचा कई दिन से मुंह का स्वाद नहीं बदला, क्यों न मुंह मीठा कर लूं?
-ठीक है, फिर पूरी तरह मुंह मीठा कर ले। इस पर आसपास के दुकानदारों ने ठहाके लगाये।
-गरीब आदमी हूं। दे दो दस के ही दे दो। उसने बेबसी से कहा।
मैंने देखा कि रेहड़ी वाले ने रसगुल्लों से भरा लिफाफा तो ले लिया और रसगुल्ले खा भी लिये पर मुंह का स्वाद सरेआम बाज़ार में अपनी गरीबी उजागर होते देख और भी कसैला हो गया।